क्रांतिकारी के महानायक शहीद मंगल पांडेय को आज ही के दिन दी गई थी फांसी





1857 की क्रांति, मंगल की दहाड़ से हिल उठा था लंदन

बलिया। शहीद मंगल पांडेय की दहाड़ से लंदन भी हिल उठी थी। वे 1857 में अंग्रेजों के दांत ही खट्टे नहीं किए, बल्कि उनके द्वारा जलाई गई क्रांति की चिंगारी से ही भारत को 15 अगस्त 1947 को आजादी मिली। ब्रिटिश हुकूमत में विरोध के कारण शहीद मंगल पांडेय को आठ अप्रैल 1857 को फांसी पर लटका दिया गया था।
क्रांति के महानायक मंगल पांडेय का जन्म 30 जनवरी 1831 को उत्तर प्रदेश के तत्कालीन गाजीपुर जनपद, बलिया तहसील अंतर्गत नगवा गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम सुदिष्ट पांडेय एवं माता का नाम जानकी देवी था। वे साढ़े 18 वर्ष की अवस्था में ही सेना में भर्ती हो गए। ईस्ट इंडिया कंपनी के 34 नंबर देसी पैदल सेना की 19वीं रेजीमेंट, 5वीं कंपनी के 1446 नंबर के सिपाही थे। उनकी प्रथम नियुक्ति पश्चिम बंगाल प्रान्त के बैरकपुर छावनी में हुई थी। एक दिन मंगल पांडेय को पता चला कि जो कारतूस हम दांत से खींच कर चलाते हैं उसमें गाय और सूअर की चर्बी लगी होती है। यह बात सुन मंगल पांडेय भड़क उठे और अपने साथियों के साथ 29 मार्च 1857 को परेड ग्राउंड में ही अंग्रेजों को ललकारते हुए विद्रोह का बिगुल बजा दिया। जिसमें अंग्रेजी पुलिस के सार्जेंट मेजर ह्यूसन और लेफ्टिनेंट हेनरी बाॅग मौत के घाट उतार दिए गए। वे पकड़े गए और उन पर मुकदमा चला। 8 अप्रैल 1857 को प्रातः 5:30 बजे परेड ग्राउंड में ही उनको फांसी के फंदे पर झूला दिया गया।

इनसेट:-
शहीद मंगल पांडेय ने सोए भारत के स्वाभिमान को जगाया

बलिया। सोए भारत के स्वाभिमान को जगाने वाले मंगल पांडेय ने अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध जो आवाज उठाई, उसकी गूंज किसी न किसी रूप में अब भी हमारे समाज में सुनाई पड़ती है। लेकिन अफसोस इस बात का है कि लोग शहीदों की कुर्बानियों को भूलते जा रहे हैं। यह बातें मंगल पांडेय विचार सेवा समिति के प्रवक्ता बब्बन विद्यार्थी ने पत्रकारों से बातचीत में कही। कहा कि बागी बलिया की अस्मिता और यहां के गौरवशाली इतिहास को कायम रखने के लिए युवाओं में अपने राष्ट्र के प्रति देश भक्ति का जज्बा पैदा करना होगा।





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